मिथकों के प्रतीक

6:43 PM

.           महज नब्बे वोट!!!
पूरा मणिपुर देश पर छा रहे वामपंथी षड़यंत्रों को समझ रहा है
मगर... मुट्ठी भर पत्रकार व तथाकथित बुद्धिजीवी लोग ऐसे बात कर रहे हैं जैसे कि पता इरोम शर्मिला कितनी ही बड़ी महानता को धारण किये हुए हैं! अभी भी नमालूम कैसे कैसे ड्रामें होंगे इरोम के नाम पर!! जब जनता ने खारिज कर दिया तो जनता को गाली दी जा रही है इन चन्दाखोरों के द्वारा... राजस्थान के कई आआपा कार्यकर्ताओं के फेसबुक वाल गोआ व पंजाब के परिणामों के बाद इरोन की आड़ लेकर विधवा विलाप से भरे हुए हैं

ये वहीं शतुरमुर्ग हैं जो बेवकूफों की तरह खुद ही लोकपाल जैसे अव्वहारिक सवाल उठाकर अपने मुंह मिया मिट्ठू हो खुद की पीठ थपथपाते  हैं और शिकायत करते हैं कि जनता इनके जनआंदोलनों की कद्र नहीं करती... अतंतोगत्त्वा केजरीवाल की  तरह वामपंथ के आकर्षक नकाब बन कर सामाजिक व राजनैतिक उथल पुथल के कारक भी सिद्ध होते हैं
आज केजरीवाल को लोकायुक्त या लोकपाल सपने में भी याद नहीं आता

इरोम के त्याग को तहेदिल से समझा जा सकता है
इन्होंने अपनी जिंदगी का स्वर्णिम हिस्सा उपवास में गुजार दिया
लेकिन बेकार के मुद्दे में और बिना कारगर उद्देश्य के। अगर मुद्दे में दम होता तो जनता भी साथ होती
यहां तक कि आयरलैंड में रहने वाला इरोम का मंगेतर डैसमंड भी पूरे चुनाव में कहीं नजर नहीं आया
उल्टा उसके किरदार को भी मणिपुर की जनता शकभरी निगाहों से देख रही थी.. कोई उसे जासूस कहता तो कोई जबरिया अनशन तुड़वाने वाला कहता
बिना कीसी जनाधार के इबोबी सिंह को चुनौति देकर अपनी मुर्खता का परिचय दे डाला और दावा किया मणिपुर की मुख्यमंत्री हो जाने का... ये ठीक वैसे ही था जैसे कीसी समय में केजरीवाल प्रधानमंत्री बनने बनारस गये थे

दरअसल इनपर केजरीवाल का प्रभाव कुछ ज्यादा ही हो गया था। तभी तो इन्होने बीजेपी पर करोंड़ों के चन्दे व टिकट जैसा घटिया आरोप लगाया...
युं कहें तो भी गलत न होगा कि दिल्ली के तुक्के के बाद केजरीवाल को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का बुखार जब सर चढ़कर बोलने लगा तो मणिपुर इनकी आड़ में और सबकुछ इनके द्वारा पा लेने के दिवास्वप्न आने लगे

केजरीवाल की अपरिपक्वता से पहले ही दबाव समूहों को जनता शक की नज़रों सें देखने लगी थी
दिल्ली के ठग से पचास हजार का चन्दा स्वीकार कर इरोम ने खामख्वाह खुद को और पूरी सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की जमात को सवालिया घेरों में लाखड़ा किया

पूरा जीवन बीत गया अनशन में... आखिर ये जमीनी हकिकत कब समझेंगी? दिल्ली जैसा इत्तेफाक हमेशां नहीं होता। उसके होने में भी कांग्रेस बीजेपी के आंतरिक कारण ज्यादा जिम्मेदार थे
अगर अन्ना जी व इरोम राजनीति से इतर जमीनी कामों में जीवन व्यतीत करती तो ज्यादा महान शख्सियत रहतीं!
और....
केवल सैनिकों की एक छोटी सी गलती या अपराध के लिये तो हम अफ्स्पा हटा नहीं सकते जो राष्ट्र की बर्बादी का कारक हो सके। वहाँ यह कल भी जरूरी था और आज भी है,
हम देख ही रहे हैं कि कुछ दिग्भ्रमित संगठन इन परिस्थितियों में भी नाकेबंदी कर रहे है है।
और
वामपंथी वहाँ पहुंचकर 'राष्ट्रों के राष्ट्र' के अपने पुराने कुटिल सिद्धांत पर देश को तोड़ने की साजिशें रच रहे हैं।

अगर युपी उतराखंड के परिणामों। से ये शिखंडी नहीं चेते तो 2019 में स्वा सत्यानाश तय है
फिर 2024 तक EVM को कोसते रहियेगा

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