कड़वा कड़वा थू
5:12 pmयोगेन्द्र यादव जैसे मीठे व शालीन प्रतीत होते वामपंथी इकोसिस्टम का इतिहास ऐसी 'सुविधाजनक चुप्पी' और 'चयनात्मक अंधेपन' के उदाहरणों से भरा पड़ा है।
इनका दोगलापन केवल वेनेजुएला तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के हर उस कोने में दिखता है जहाँ इनके वैचारिक आका सत्ता में होते हैं
चाणक्य नीति में ऐसे लोगों के लिए सबसे प्रसिद्ध वचन है जो मुँह पर मीठे होते हैं और पीठ पीछे षड्यंत्र रचते हैं
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥
अर्थात जो व्यक्ति सामने मीठी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ने का प्रयत्न करता हो, ऐसे व्यक्ति को उसी प्रकार त्याग देना चाहिए जैसे उस घड़े को जिसके मुख पर दूध लगा हो लेकिन भीतर हलाहल विष भरा हो। (यह ठीक उन्हीं वामपंथी विचारकों पर लागू होता है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर अराजकता का विष फैलाते हैं)।
जो वामपंथी भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक छाती पीटते हैं, वे चीन के झिंजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों पर हो रहे भीषण अत्याचारों, उन्हें डिटेंशन कैंपों में रखने और उनकी धार्मिक पहचान मिटाने पर पूरी तरह मौन रहते हैं। कारण स्पष्ट है चीन उनके वैचारिक ब्रह्मांड का केंद्र जो है।
तिब्बत के दमन पर इनके मुँह में दही जम जाता है मानवाधिकारों की बात करने वाले ये 'बुद्धिजीवी' तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे और वहां की सांस्कृतिक हत्या पर कभी कोई विरोध प्रदर्शन नहीं करते।
इनके लिए साम्राज्यवाद केवल वही है जो पश्चिम या भारत की दक्षिणपंथी सरकारें करें; चीन का विस्तारवाद इनके लिए 'प्रगति' है।
ऐसे ही यूक्रेन में जेलेंस्की की मूर्खता के कारण जब आम लोग मारे जाते हैं, तो ये सीधे तौर पर रूस की निंदा करने से बचते हैं। इनका सारा जोर नाटो (NATO) को कोसने पर होता है ताकि पुतिन के सभी कार्यों को अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराया जा सके
बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर ये अक्सर चुप्पी साध लेते हैं या उसे 'राजनीतिक अस्थिरता' का नाम देकर दबा देते हैं। ठीक इसी तरह, पश्चिम बंगाल में दशकों तक चली राजनीतिक हिंसा और हत्याओं को इन्होंने 'वर्ग संघर्ष' कहकर जायज ठहराया।
दुष्ट व्यक्ति चाहे कितना भी विद्वान या 'बुद्धिजीवी' क्यों न हो, उसकी कुटिलता उसे खतरनाक धोखेबाज ही बनाती है
दुर्जन: प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम्।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम्॥
अर्थ: यदि कोई दुष्ट व्यक्ति मीठी बातें करने लगे, तो भी उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। उसके जीभ की नोक पर तो शहद होता है, लेकिन हृदय में कालकूट विष भरा होता है।
भारतीय वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्र का यह दोगलापन कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित कूटनीतिक धूर्तता है।
इनका पूरा वैचारिक ढांचा 'सिलेक्टिव आउटरेज' यानी चयनात्मक आक्रोश पर टिका हुआ है ये ख़त्म ही होंगे सुधर नहीं सकते
यथा श्वा लंगुलं प्रक्षिप्तं न चोत्थापयितुं क्षमम्।
तथैव खलचित्तं च न शक्यं विनिवर्तितुम्॥
अर्थ: जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ को पाइप में डालकर सीधा करने की कोशिश की जाए, तो भी वह बाहर निकलते ही फिर टेढ़ी हो जाती है, उसी प्रकार दुष्ट और कुटिल व्यक्ति का चित्त कभी सीधे मार्ग पर नहीं आता। वह अपनी धूर्तता का अवसर खोज ही लेता है।
वेनेजुएला के मामले में इनकी चुप्पी के पीछे सबसे बड़ा तथ्य यह है कि निकोलस मादुरो का शासन उसी '21वीं सदी के समाजवाद' का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका सपना ये भारत में बैठकर देखते हैं।
जब मादुरो चुनाव परिणामों में धांधली करते हैं, विपक्षी नेताओं को जेल में डालते हैं और सेना के दम पर जनता की आवाज को कुचलते हैं, तो भारत के वामपंथी बुद्धिजीवियों के लिए "लोकतंत्र के खतरे" वाले सारे सिद्धांत अचानक ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
इन आजकल के तथाकथित 'लिबरल' बुद्धिजीवियों पर यह श्लोक बिल्कुल सटीक बैठता है:
दुर्जन: परिहर्तव्यो विद्यया अलंकृतोऽपि सन्।
मणिना भूषित: सर्प: किमसौ न भयंकर:॥
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए, चाहे वह विद्या (डिग्री या ज्ञान) से अलंकृत ही क्यों न हो। क्या मणि से सुशोभित सर्प भयानक नहीं होता? अर्थात्, ज्ञान यदि कुटिल व्यक्ति के पास हो, तो वह समाज के लिए और भी अधिक घातक हो जाता है।
तथ्यात्मक रूप से देखा जाए तो यही वह वर्ग है जो भारत में संवैधानिक रूप से चुनी गई सरकार को 'तानाशाही' बताता है, लेकिन वेनेजुएला में हो रहे वास्तविक दमन पर एक शब्द नहीं बोलता।
जब वहां की मुद्रास्फीति लाखों प्रतिशत में पहुंच गई थी और करोड़ों लोग देश छोड़ने पर मजबूर हुए हैं, फिर भी ये 'सियार' खामोश थे क्योंकि मादुरो का पतन उनके वैचारिक साम्राज्य की हार होती
इनकी धूर्तता इस बात से सिद्ध होती है कि ये बांग्लादेश या श्रीलंका की अस्थिरता पर तो भारत में 'हल्ला बोल' के सपने देखते हैं, लेकिन मादुरो की सत्तावादी पकड़ पर मौन साध लेते हैं क्योंकि वहां उनका 'कॉमरेड' सत्ता में था
इनका दोगलापन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखता है। एक तरफ ये मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं, और दूसरी तरफ उन तानाशाहों के साथ खड़े होते हैं जो अपनी ही जनता का खून बहा रहे होते हैं।
वेनेजुएला में जब चुनाव आयोग (CNE) बिना किसी पारदर्शी आंकड़े के मादुरो को विजेता घोषित कर देता है, तो भारत के वामपंथी उसे 'साम्राज्यवाद के खिलाफ जीत' का समाजवादी जामा पहनाने की कोशिश करते हैं।
आज इनकी पूंछ इसलिए दबी हुई है क्योंकि आज वेनेजुएला की जनता स्वयं उस तथाकथित समाजवाद को नकार चुकी है जिसे ये लोग भारत पर थोपना चाहते हैं।
यह चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि इनका लोकतंत्र प्रेम केवल एक मुखौटा है, जिसका उपयोग ये केवल अपनी पसंद की सरकारों को अस्थिर करने के लिए करते हैं।
जैसे ही इनकी अपनी विचारधारा कटघरे में आती है, इनका सारा 'क्रांतिकारी' जोश शर्मनाक सन्नाटे में बदल जाता है।
इनकी कुटिलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि ये उस लोकतंत्र की थाली में छेद करते हैं जो इन्हें बोलने की आजादी देता है, और उन तानाशाहियों के कसीदे पढ़ते हैं जहाँ इन्हें एक शब्द बोलने पर भी गायब किया जा सकता है। वेनेजुएला पर इनकी चुप्पी यह साबित करती है कि इनका 'क्रांतिकारी' चोला अब तार-तार हो चुका है और उसकी धूर्तता जनता के सामने पूरी तरह नग्न है।
विदुर नीति में इन्हीं कपटी लोगों के लिए कहा गया है
नैक: स्वादु भुञ्जीत नैकश्चार्थान् प्रचिन्तयेत्।
नैको गच्छेत् पथानं नैक: सुप्तेषु जागृयात्॥
अर्थात् स्वार्थी और कुटिल व्यक्ति केवल अपने लाभ के लिए जागता है और दूसरों के सोते ही (अर्थात् समाज के असावधान होते ही) अपनी चालें चलना शुरू कर देता है।

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