ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्
3:09 pmएक ओर तो चार्वाक का वह विलासिता पूर्ण दर्शन है जिसने आज पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों की आर्थिक नींव को खोखला कर दिया है, तो दूसरी ओर कौटिल्य का वह कठोर अनुशासन है जो झारखंड के आंकड़ों में बचत के रूप में परिलक्षित हो रहा है।
चार्वाक दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र हम सबने सुना होगा “यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" अर्थात जब तक जियो सुख से जियो और कर्ज लेकर भी घी पियो,
आज इन 'तथाकथित विकसित' कहे जाने वाले राज्यों का मूलमंत्र बन गया है।
पंजाब और राजस्थान की स्थिति को देखकर लगता है कि उन्होंने चार्वाक के इस विचार को शासन की नीति मान लिया है, जहाँ भविष्य की पीढ़ी के संसाधनों को आज की लोक-लुभावन योजनाओं की अग्नि में स्वाहा किया जा रहा है।
जब पंजाब अपनी कमाई से ७२% अधिक घाटे में है और राजस्थान का शेष बजट नकारात्मक है, तो यह स्पष्ट है कि वे 'भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः' (शरीर के राख हो जाने के बाद पुनर्जन्म कहाँ और फिर चुकाना किसे है) की सोच के साथ केवल वर्तमान वोटबैंक को संवारने में लगे हैं, चाहे उसके लिए आने वाली पीढ़ियां कर्ज के बोझ तले दब जाएं।
इसके विपरीत, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों के आंकड़े कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' की नीति का स्मरण कराते हैं जहाँ राजकोष की सुरक्षा को सर्वोपरि माना गया है।
चाणक्य ने स्पष्ट कहा था “कोशपूर्वाः सर्वारम्भाः" अर्थात किसी भी कार्य या परियोजना की सिद्धि राजकोष पर निर्भर करती है। जिस राज्य का कोष रिक्त है, वह अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा नहीं कर सकता जो निकोलस मादुरो की दुर्दशा देख समझा जा सकता है
झारखंड द्वारा अपनी कमाई का लगभग आधा हिस्सा बचा लेना चाणक्य सिद्धांत की पुष्टि करता है जिसमें वे कहते हैं कि एक कुशल शासक को आय का चतुर्थांश (चौथा हिस्सा) हमेशा आपातकाल और भविष्य के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।
इस फोटो में राजस्थान का पतन विशेष रूप से विस्मयकारी है, क्योंकि यह शौर्य और स्वाभिमान की वह भूमि रही है जहाँ 'अपरिग्रह' और संसाधनों के उचित प्रबंधन का इतिहास था।
किंतु आज वहां कर्ज की किश्तें चुकाने के लिए पुनः कर्ज लेने की स्थिति यहाँ भी उत्पन्न हो गई है।
यह चाणक्य की उस चेतावनी की अनदेखी है जिसमें उन्होंने कहा था कि जो राजा अपनी आय से अधिक व्यय करता है, वह शीघ्र ही अपने राज्य को विनाश की ओर ले जाता है।
जो आत्मघाती योजनाएं गहलोत ने जनहित की आड़ में वोट बटोरने हेतु लागू की थी वो सबकी सब CMO व CMR की चकाचौंध में सुधबुद खो चुके मान्यवरों के शासन में चलती हुई नज़र आती हैं
झारखंड का अधिशेष धन यह दर्शाता है कि भले ही वहाँ चमचमाते बाजार या सड़कें न हो लेकिन वहां अभी भी राजकोषीय अनुशासन शेष है, परंतु यह विडंबना ही है कि अनुशासित राज्यों का यह धन अंततः उन राज्यों की अर्थव्यवस्था को सहारा देने में लग जाता है जो वित्तीय अनैतिकता और वोटों के लिए रेवड़ी बांटने या कर्जमाफी की राजनीति में डूबे हुए हैं।

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