नववर्ष माने क्या?

5:22 pm


आध्यात्मिक दृष्टि से नववर्ष केवल कैलेंडर की तारीख बदलना भर ही नहीं है, बल्कि यह स्वयं के स्वरूप को पहचानने और काल के बंधन से मुक्त होने का एक अवसर है। 

समय (यानी काल) माया की रचना है। जिस माया के कारण हम स्वप्न में वर्षों का अनुभव कुछ ही मिनटों में कर लेते हैं, उसी प्रकार जाग्रत अवस्था का 'वर्ष' भी उसी माया का एक हिस्सा है। 


आदि शंकराचार्य 'दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्' में इसी सत्य को उद्घाटित करते हैं:

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं,

पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।

अर्थात्, यह विश्व दर्पण में दिखने वाले नगर के समान है जो हमारे भीतर ही है, पर माया के कारण बाहर प्रतीत होता है। 

इसको ही गुरबाणी यूँ कहती है:

जगतु मै झूठु करि मानिओ ॥

ज्यों सुपना अरु पेखना ऐसे इहु कउ जानिओ ॥

अर्थात्, मैंने इस संसार को मिथ्या मान लिया है। जिस प्रकार कोई स्वप्न या नाटक का खेल होता है, इस जगत को भी वैसा ही (परिवर्तनशील और नश्वर) जानो। 


नववर्ष का 'काल' भी इसी मायावी दर्पण की एक लहर मात्र है। 

हर नववर्ष हमें केवल यह याद दिलाता है कि समय तो निरंतर बह रहा है, लेकिन हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो अचल और शाश्वत है। मुख्य सार 'विवेक' से यह समझना है कि क्या स्थायी है और क्या अस्थायी है। वर्ष, महीने, दिन और हमारा शरीरादि ये सब परिवर्तनशील और अनित्य हैं। 


‘विवेकचूडामणि' में इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए कहा गया है:

न ह्यस्त्यभावो विदुषः स्वरूपतः

किन्त्वस्ति भावोऽनृतवस्तुयोगतः।

अज्ञानकल्पितस्यास्य विनाशो विद्यया भवेत्

न ह्यन्यथा कल्पितस्य विनाशे नित्यतोच्यते ॥

अर्थात्, अज्ञान द्वारा कल्पित असत्य वस्तु में नित्यता कहाँ? केवल आत्म-तत्व ही स्वयं सिद्ध और नित्य है। 


इस नश्वरता के प्रति सचेत करते हुए इस पर गुरबाणी का फरमान है:

जो उपजिओ सो विणसि है परो आजु कै कालि ॥

नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥

अर्थात्, जो भी पैदा हुआ है वह आज या कल नष्ट हो जाएगा। इसलिए सब जंजाल छोड़कर उस परमात्मा के गुण गाओ। 


जो चैतन्य पिछले वर्षों और शताब्दियों में भी था और इस साल भी है, वही नित्य है। नववर्ष का सच्चा उत्सव तब है जब हम इस नश्वर समय से हटकर उस अविनाशी आत्मा की ओर मुड़ें। 


गीता में भी इसी शाश्वतता की पुष्टि की गई है:

न जायते म्रियते वा कदाचि-

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

अर्थात्, यह आत्मा न कभी जन्मता है और न मरता है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के नष्ट होने पर भी यह नहीं बदलता। जब साधक इस अभेद अवस्था को अनुभव करता है, तब वह जान पाता है

यही संकेत गुरबाणी कर रही है

ततु निरंजनु जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ ॥

अर्थात्, वह माया-रहित परमात्मा ज्योति सभी में समाई हुई है; उस परमात्मा और मुझमें (सोहं) अब कोई भेद नहीं रह गया है। 


‘नया’ होने का वास्तविक अर्थ है पुरानी गलतफहमियों, अहंकार और अज्ञान का त्याग करना। 

जैसे ही आत्मज्ञान का उदय होता है, वैसे ही मनुष्य का आध्यात्मिक पुनर्जन्म होता है। 

पुराने संस्कारों को छोड़कर वर्तमान क्षण में पूर्णतः जागृत होना ही वास्तविक नववर्ष है। 

एक आम व्यक्ति इन संस्कारों को 'साक्षी भाव' से छोड़ सकता है। 

जैसे ही हम विचारों के प्रति तटस्थ होते हैं, वैसे ही संस्कारों की शक्ति क्षीण होने लगती है। 


गुरबाणी में मन को वश में करने का सूत्र दिया गया है:

मनु कुंचरु काइआ उदिआनै 

माउतु सबदु अंकुसु सिरि धरिओ ॥

अर्थात्, यह मन एक हाथी के समान है जो शरीर रूपी जंगल में भटक रहा है; इसे गुरु के शब्द (ज्ञान) रूपी अंकुश से ही नियंत्रित किया जा सकता है। 


जब हम स्वयं को शरीर और समय की सीमाओं से मुक्त अनुभव करते हैं, तब हम 'निर्वाणषट्कम' के इस भाव को जीते हैं:

न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेदः,

पिता नैव मे नैव माता न जन्म।

चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥


बीता हुआ कल्पित वर्ष सुखद रहा हो या दुखद, हमें 'साक्षी भाव' में रहना होगा। 

नववर्ष एक तटस्थ मोड़ है जहाँ हम पिछले अनुभवों से आसक्ति छोड़कर पूर्ण समर्पण के साथ भविष्य का स्वागत करते हैं। गुरबाणी के अनुसार सच्चा समय वही है जो बोध में बीते:

सा रुति सुहावी जितु हरि चिति आवै ॥

सो माहु भला जितु नामु कमावै ॥

अर्थात्, वही ऋतु सुंदर है जिसमें ईश्वर याद आए और वही महीना भला है जिसमें सत्य के नाम की कमाई की जाए। 


हर वह क्षण नववर्ष है जब आप यह अनुभव करते हैं कि आप समय के अधीन नहीं हैं, बल्कि आप वह चैतन्य हैं जिसमें समय कल्पित व बीतता हुआ प्रतीत हो रहा है। 


यह केवल तिथि बदलने का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण बदलने का पर्व है।


मुमुक्षु वही है जो हर अवसर पर आत्मचिंतन करके उसमें से जानने योग्य तत्व को पहचान ले 

आंग्ल नववर्ष पर हम अपने स्वरूपबोध को प्राप्त हों यही मंगलकामना है 


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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